मुजफ्फरनगर। किसानों और मजदूरों की मांगों पर केंद्र सरकार की उदासीनता के विरोध में बुधवार को संयुक्त किसान मोर्चा ने जिलाधिकारी कार्यालय के बाहर धरना दिया। धरने में मोर्चा के पदाधिकारी मौजूद रहे और उन्होंने राष्ट्रपति को संबोधित 10 सूत्रीय विस्तृत ज्ञापन डीएम को सौंपा। संयुक्त किसान मोर्चा ने कहा कि 26 नवंबर 2020 को शुरू हुए ऐतिहासिक किसान आंदोलन की वर्षगांठ पर देश भर के किसान एक बार फिर मजबूरी में सड़क पर उतरने को विवश हुए हैं। किसान नेताओं ने आरोप लगाया कि 9 दिसंबर 2021 को केंद्र सरकार द्वारा लिखित आश्वासन जिसमें एमएसपी के तहत कानून बनाना शामिल था, आज तक लागू नहीं किए गए हैं और उलटे सरकार के नीतिगत कदमों ने किसानों की आर्थिक स्थिति और कठिन बना दी है। मोर्चा ने कहा कि घोषित MSP के बावजूद उत्तर प्रदेश, बिहार और अन्य कई राज्यों में धान एमएसपी से 200 से 900 रुपये प्रति क्विंटल कम दाम पर बिक रहा है, जबकि केरल, छत्तीसगढ़ और ओडिशा ने C2+50% के अनुसार MSP लागू कर किसानों को राहत दी है। SKM ने केंद्र सरकार से पूरे देश में किसानों की लूट रोकने के लिए प्रभावी कानून बनाने की मांग की है। धरने में सरकार पर बड़े कॉरपोरेट घरानों को कर्ज माफ करने और आम किसानों पर बोझ डालने का आरोप भी लगाया गया। ज्ञापन में कहा गया कि उर्वरक सब्सिडी में कटौती, नैनो उर्वरकों की जबरन बिक्री, मनरेगा में कार्यदिवसों की कमी और डीएपी-यूरिया की काला बाज़ारी से ग्रामीण क्षेत्र बदहाल हैं। इस दौरान मोर्चा ने राष्ट्रपति को भेजे ज्ञापन में 10 सूत्रीय मांगें रखीं, जिसमें सभी फसलों के लिए एमएसपी @ सी 2+50 प्रतिशत के साथ गारंटीड खरीद कानून बनाना, किसानों और कृषि मजदूरों के लिए व्यापक ऋण माफी योजना लागू करना, बिजली बिल 2025 वापस लेना और मुफ्त कृषि बिजली सुनिश्चित करना, चार श्रम संहिताओं को वापस लेना व सभी श्रमिकों को सामाजिक सुरक्षा प्रदान करना, मनरेगा में 200 दिन का काम और 700 रुपये दैनिक मजदूरी सुनिश्चित करना, एफटीए पर रोक लगाना, कपास पर आयात शुल्क बहाल करना और पीडीएस-एफसीआई को सुरक्षित करना, उर्वरक सब्सिडी बहाल करना और काला बाज़ारी रोकना, बाढ़ और आपदाओं को राष्ट्रीय आपदा घोषित कर किसानों और मजदूरों को मुआवजा देना, जबरन भूमि अधिग्रहण और बुलडोज़र नीति समाप्त करना तथा राज्यों की वित्तीय स्वायत्तता की रक्षा करना और कृषि में सार्वजनिक निवेश बढ़ाना शामिल है। संयुक्त किसान मोर्चा ने चेतावनी दी कि यदि सरकार ने जल्द वार्ता कर ठोस कदम नहीं उठाए, तो किसानों और मजदूरों का देशव्यापी, शांतिपूर्ण लेकिन दीर्घकालीन संघर्ष अनिवार्य होगा।







