टैफिक पुलिस का बडा अमला होने के बावजूद यातायात सुधार को नहीं किया कोई प्रयोग
यातायात पुलिसकर्मियों की नाक के नीचे सबसे ज्यादा उड रहा नियमों का मजाक
मुजफ्फरनगर। एक एसपी, सीओ, इंस्पेक्टर, उप निरीक्षक, हेड कांस्टेबल और कांस्टेबल का लंबा चैड़ा अमला होने के बावजूद मुजफ्फरनगर शहर में यातायात पुलिस एक मार्ग पर भी वन-वे व्यवस्था लागू नहीं हो पा रही है। बस सिर्फ चालान के शिकार को ढूंढने में ही ज्यादा ध्यान लगा रही है। यातायात नियमों का दम भरने वाली ट्रैफिक पुलिस की आंखों के सामने सबसे ज्यादा नियमों का मजाक उड़ रहा है। हैरानी की बात यह है कि यह सब देखकर चुप्पी साधने वाली यातायात पुलिस सिर्फ राजस्व बढ़ाकर अधिकारियों की वाह-वाही लूट रही है।
बढ़ती आबादी और यातायात के साथ बड़े शहरों में ढेर सारे बदलाव हो गए, लेकिन मुजफ्फरनगर शहर जैसा दस साल पहले था, आज भी यातायात प्रबंधों को लेकर वहीं खडा है। यातायात पुलिस में एसपी स्तर के अधिकारी की तैनाती होने के बाद भी कोई बदलाव नहीं आया है। इस पद पर कई एसपी आए और चले गए, लेकिन शहर में एक भी रोड कभी वन-वे नहीं बन पाया। पहले तो स्टाफ कमी का रोना था, लेकिन अब पर्याप्त पुलिस बल उपलब्ध होने के बाद हालात जस के तस है। फिलहाल एक एसपी, सीओ, टैफिक इंस्पेक्टर, 16 दरोगा, 26 हेड कांस्टेबल, 44 सिपाही और 27 होमगार्डो के कंधों पर यातायात संभालने की जिम्मेदारी है।
सीओ सिटी ऑफिस के चैक पर सबसे ज्यादा यातायात पुलिस कर्मियों और सहायक के रूप में होमगार्ड के जवानों का तांता रहता है। बावजूद इसके यहां बरसों पूर्व घोषित वन-वे व्यवस्था लागू नहीं कर पाई है। यही से कुछ दूरी पर मालवीय चैक तिराहा देश का ऐसा पहला ऐसा तिराहा, जहां हर पल यातायात नियमों की धज्जियां उड़ती है। जहां पर तीन साइड का यातायात एक ही मार्ग पर चलता है। आए दिन वाहनों में टकराव भी होते है, लेकिन यातायात पुलिस के पास इस तिराहे के सुधार के लिए कोई कार्ययोजना नहीं है। इसके अलावा एसडी मार्किट, हनुमान चैक, भगत सिंह रोड आदि मार्गो पर भी दिन भर वाहन चालक यातायात नियमों का ठेगा दिखाते रहते है। सवाल उठता है कि क्या यातायात पुलिस का काम सिर्फ चालान करना ही है, क्योंकि शहर में यातायात व्यवस्था में सुधार पर काम नहीं हो पा रहा है। क्या शहर के कई मार्गो पर वन-वे जरूरी नहीं है।






